ANCIENT INDIA -INDUS VALLEY CIVILIZATION | Religion,culture, timeline, technology,occupation,age,architecture etc


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इंडस वैली सिविलाइज़ेश

हमारे विस्व के इस लम्बे इतिहास में कई सभ्यताए बनी और नस्ट हुई। पर उनके निसान आज भी मौजूद है।  ऐसी ही एक सभ्यता है इंडस वैली या सिंधु घहटि सभ्यता।  यह प्राचीन विवा की ४ महँ सभ्यताओं में से एक थी।
जिनमे शामिल है मेसोपोटेमिअ, प्राचिन मिश्र  और येलो रिवर सभ्यता। मगर इन सभी में से अगर हम देखे तो सिंन्धु घाटी सभ्यता कुछ ख़ास थी।  इसकी एक्सकवेशन  साइट्स के आसपास मिले  अवशेषो से यह पता चलता है की यह अपने समकालीन दूसरी सभ्यताओं की तुलना में अपने समय से काफी आगे थी।

इसेके  प्रमुख  साइट्स हरप्पा और मोहनजोदड़ो और अन्य जगहों पर मौजूद इसकी बस्तिओ के अवशेषों ये यह पता चलता है की इस सभ्यता की बस्तिया आज की कई आधुनिक बस्तियों से भी अधिक बेहतर थी।  मसलन इन के सहर बेहत सुनियोजित संरचना वाले थे।  इनमे सड़के एक दूसरे को ठीक समकोण पर मिलते थे।  हर घर में सवचालय व संग्रह की  वेवास्ता थी जो बेहतरीन नाली प्रणाली से जुड़े हुए थे।  छोटी गलियों के साथ साथ  बड़ी मुख्या सड़के भी थी ताकि बैल गाड़ी व अन्य वाहन साजो सामान को आसानी से पहुंचा सके। सहर के मध्य में granaries भी मौजूद थे यहाँ  लोग अनाज को जमा करते होंगे।  इसके आलावा एक विशाल पोखरा भी था जिसे पुरातत्वशास्त्रियो ने the great bath  नाम दिया है।  वो सायद सामूहिक स्नानगृह की तरह इस्तेमाल किया  जता होगा।

  इंडस वैली का विस्तार 

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इंडस वैली का विस्तार 

सभी प्राचीन सभ्यताओं मेसे इसका क्षेत्रफल सबसे अधिक था यह पूर्वी अफगानिस्तान , पाकिस्तान  से ले कर भारत के उत्तरी-पस्च्मि भाग व गुजरात तक फैला हुआ था।  यह सभ्यता एक काश्य युग या ब्रोंज युग सभ्यता थी।  जो की ३३०० BCE  से १९००  BCE  तक मौजूद रही।  इसे सिंधु घाटी सभ्यता या Indus Valley Civilization कहा जाता है क्युकी इसके खोजबीन के सूरूति दिनों में मिले ज्यादातर साइट्स या बस्तिया सिंधु घाटी या Indus Valley  में ही पाई गई थी।  पर आज इसकी 1,022  जितनी बस्तिया खोजी जा चुकी है जिनमे से  616 भारत में ,406 पाकिस्तान में  स्तित है।  इसकी कुछ छोटी बस्तिया अफगानिस्तान के पूर्वी छोर पर भी मौजूद पाई गई है।
सिंधु गति की ज्यादातर बस्तिया Indus  और Ghaggar-Hakra Rivers और इनकी ट्रिब्यूटेरिएस के आसपास स्तित है।  इस सभ्यता  के दक्षिणी छोर पर मौजूद है लोथल और धोलावीरा जो की गुजरात में है।  धोलावीरा एक बन्दरगाह की तरह नजर आता है सायद यहा से  व्यापारिक जहाजा या नाव मेसोपोटेमिया तक व्यापर करने जाते थे।  मेसोपोटेमिया और सिंधु घाटी के लोगो के बीच संभावित व्यापर के सबूत इस बात से मिलते है की इंडस वैली के कुछ स्टैम्प्स व  अन्य ऐसी चीजे मेसोपोटेमिया के साइट्स पर भी प्राप्त हुई है।  इस सभ्यता के सेहरो में रहने वाली ज्यादातर  आवादी खेती करती होगी।  और इनके पास अतिरिक्त उपज भी होती होगी जिसका अंदाजा साइट्स पर मिली ग्रनारिएस से अंदाजा  लगाया जा सकता है।  और यह व्यापर भी करते थे जिसके बारे में अभी आप को बताया।  यह लोग ज्यादातर जौ , गेहू ,बाजरा , चना , मटर इत्यादि जैसे रबी फसलो की खेती करते थे।  इनमे गेहू और जौ मुख्य थे।
खेती के साथ साथ वो पशुपालन  के काम में भी थे।  यह गाए , बैल , बकरी, भेड , इत्यादि का पालन करते थे।

  सिंधु घाटी की शिल्प कला 

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घड़ा 

हयहाँ  के लोग शिल्प कला व अन्य कलाओ के भी जानकार थे यह पर मिली अलग अलग प्रकार की कलात्मक वस्तुए जैसे की सील , घड़े, मुर्तिया व अन्य ऐसी चीजे।  इंडस वैली के साइट्स पर मिली कुछ ख़ास चीजे जैसे की पुजारी की मूर्ति, पशुपति की सील, यूनिकॉर्न की सील, व डांसिंग गर्ल की मूर्ती यह बताती है के ये लोग कला में भी काफी पारंगत थे।  इसके साइट्स किसी भी प्रकार के हथियार या अन्य लड़ाई की कोई चीजे प्राप्त नहीं हुई जो यह दर्शाती है के यह के लोग शान्तिमय तरिके से रहते थे।  इतना ही नहीं किसी राजा या मुखिया के रहने की जगह जैसे महल या ऐसी किसी चीज की फाई पहचान इसके सहेरो अवशेषों में नहीं दिखाई पड़ते है जो यह दर्शयता है की सायद यहां लोग सामूहिक तौर पर फैसले करते होंगे। यहा की हर एक बस्ती में वजन व अन्य नापने की चीजों में काफी समानता दिखाई देती है और हर एक साइट पर मिले इंट लगभग एक ही माप के है जिससे यह स्टैण्डर्डडाइसेशन या मानक प्रक्रिया के होने का अंदाजा मिलता है।

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 पुजारी की मूर्ति

हम इस सभ्यता के बारे में जो भी चीजे जानते है वे सभी पुरातत्व अवशेषों के अध्ययन के माद्यम से ही पता  चली है।  इस सभ्यता की अवशेषो में मिली  चीजों की लिखावट को अभी तक समझा नहीं जा सका है।  इसलिए हम सिंधु घाटी सभ्यता के लोगो की आम जीवन के बारे में कुछ नहीं जानते।  हमे तो यह भी नहीं मालूम की ये खुद को क्या कहते थे , इनका धर्म कैसा था , इनके सहेरो के क्या नाम थे।  इस सभ्यता से संबंधित जो भी नाम हम सुनते या पढ़ते है वे सभी पोरातत्वशास्त्रियों दयारा दिए गए है।

सभ्यता  का खत्मा 

करीब १९०० वर्षो तक आस्तित्व में रहने के बाद यह सभ्यता खत्म हो गई।  ३३०० BCE  से १९००  BCE  तक फलने-फूलने के बाद किन्ही अनजान कारणों से यह खत्म हो गई।  अलग अलग लोगो  ने इसकी  संभावित वजहें दी है  पर पक्के और तौर  कुछ नहीं कहा  जा सकता है।  सायद किसी बाढ़, या सूखे या आया किसी प्राकृत करने से यह सभ्यता समाप्त  हो गई।

इसके सबसे बड़े दो विशाल सहेरो मोहनजोदड़ो और हरप्पा को सबसे पहले खोजा गया था।  पहले हरप्पा खोजै गया था और सं १९२१ में हरप्प की खोज  हुई।  बाद में मोहनजोदड़ो की और फिर धीरे धीरे बाकि अन्य साइट्स की। क्युकी सबसे पहले हरप्पा को खोजा  गया था।  इसलिए इस सभ्यता को हरप्पा सभ्यता जाना  जाता है।

हरप्पा की  खोज

हरप्पा के खोज और एक्सकवेशन  की कहानी भी बड़ी दिलचस्प है।  भले ही जिस जगह को हरप्पा के नाम से जाना जाता है उसकी खुदाई १९२१ में सुरु हुई पर उसके बारे में बहोत पहले से ही लोगो को पता था।  तो कहानी यह है की सं 1856 में  ईस्ट इंडियन रेलवे कंपनी द्वारा कराची से लाहौर के बीच  रेलवे की पटरिया बिछवाई जा रही  रही थी।  जिसका काम संभल रहे थे दो ब्रिटिश  इंजीनियर  John और  William Brunton जो की दोनों  भाई थे। उन्हे  रेलवे लाइन को बिछाने के लिए बलास्ट की आव्सय्कता थी। जिन्हे नहीं पता की बलास्ट क्या होता है उन्हें  बता दे की बलास्ट उस कंकड़ और पत्थर  है जिन्हे पटरियों के बीच में और इर्दगिर्द डाला जाता है।  जो की कुछ सुडोल  जगहों पर पहोचाना मुश्किल था जहा से  लाइन  थी।  इन इंजीनियर भाइयो को एक जगह के बारे में  मालूम पड़ा जो की किसी ऐतहासिक सहर के अवशेष थी यहाँ पर बहोत सार  पके हुए इट मौजूद है।  इस जगह से पास के गांव के लोग  पहले से ही यहाँ से इट  ले जाते थे।  तो उन्हे  ने उस जगह से इट निकल कर बलास्ट की तरह उपयोग करने का पैसला किया।  यहां से इट  निकाल कर लाहौर-कराची लाइन की १०० KM  से भी अधिक  बिछाई गई। इट निकलने के दौरान इन्हे कुछ सेल्स और अन्य टुकड़े मिले।  जिन्हे  बाद में एक और ब्रिटिश इंजीनियर जिन्हे पुरातत्व में भी दिलचस्पी थी Alexander Cunningham ने देखा।  और इनके बारे में लिखा।  उनके अनुसार अवशेषों में मौजूद लिखावट ब्राह्मी लिपि की  थी पर बाद में यह पता चला की वे गलत थे।  क्युकी उस समय तक सभी को यही लगता था की भारत की सुरुवात आर्यन के आने के बाद से हुई।  जो की सिंधु घाटी के खत्म होने के बाद आये थे।  इस लिए किसी को इन अवशेषों की प्राचीनता के बारे में कोई अंदाजा नहीं  था।  धीरे-धीरे जब यह एहसास हुआ की यह अभी तक के पाए गए चीजों से कुछ अलग है।  तब जा कर इनकी प्राचीनता को समझा गया।   १९२१ में  Daya Ram Sahni और Madho Sarup Vats ने इस साइट जिसे हरप्पा के नाम से जाना जाता है उसकी खुदाई सुरु की फिर वैज्ञानिक तरीको से इनका आधयान करने के बाद इनके सही उम्र का पता चला।

भले ही आज यह सभ्यता समाप्त हो चुकी है पर इसके लोगो और सहेरो के बारे में हमे जो भी पता चला है।  उसके मद्दे नजर ये कई मामलो में आज के कई  आधुनिक कस्बो व सहेरो से भी ज्यादा बेहतर था।  मसलन सुनियोजी सहर,  नाली , चौड़ी सड़के, हर घर में शौचालय की सुबिधा इत्यादि जो आज भी कई जगहों पर मौजूद नहीं है।  धन्यवाद।  

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